देशभर के उच्च शिक्षा के शिक्षकों की “मन की बात”-Online Survey during Lockdown

देश एक अभूतपूर्व संकट से गुज़र रहा हैं। भारत के हर वर्ग ने कोरोना के इस संकट में अपनी लड़ाई हैं। परन्तु एक वर्ग ऐसा हैं जिसका अधिकांश हिस्सा मध्यम वर्ग से आता हैं, वह हैं शिक्षक वर्ग।  भाषणों और किताबों के पन्नों मैं हमेशा से शिक्षकों का सम्मान होता रहा हैं पर वास्तव में सबसे ज्यादा शोषण भी शिक्षकों का ही होता हैं।

AICTE और UGC से संबधित उच्च शिक्षा के निजी महाविद्यालयों के शिक्षकों को भी इस संकट में वित्तीय परेशानियों से जूझना पड़  रहा हैं। एक आकड़े के अनुसार भारतवर्ष में 30000 निजी महाविद्यालय और विश्वविद्यालय हैं जिसमे लगभग करीब 60 लाख शैक्षणिक एवं गैर शैक्षणिक कर्मचारी कार्य करते हैं। इतना बड़ा समूह होने क बाद भी दुर्भाग्य से किसी भी चुनाव मैं या किसी भी राजनितिक पार्टी के लिए शिक्षकों का विकास मुद्दा नहीं रहता।

लॉकडाउन के समय की बात करे तो केवल शिक्षा के एक मात्रा क्षेत्र हैं जिसे एक पैसे का भी नुकसान नहीं है। लेकिन फिर भी प्रोफेसर्स को कई  महाविद्यालयों ने मार्च से ही सैलरी देना बंद कर दी या सैलरी का कुछ प्रतिशत ही दिया। 

हाल ही में इंजीनियरिंग एजुकेशन न्यूज़ पोर्टल  द इन्फमित और  ऑल इंडिया प्राइवेट कॉलेज एम्प्लॉयी एसोसिएशन (AIPCEU) द्वारा कराये गए उच्च शिक्षा के शिक्षकों सर्वे में चौकाने वाली बात सामने आयी  हैं की कई कॉलेज प्रबंधन ने मार्च से ही अपने स्टाफ को सैलरी देना बंद कर दिया या सैलरी का कुछ प्रतिशत ही दिया हैं।  राष्ट्रिय स्तर पर कराये गए इस सर्वे में लगभग 1200 शिक्षकों ने भाग लिया जिसमे यह आया हैं की मार्च महीने में ही 51% प्रतिशत कॉलेजो ने सैलरी नहीं दी या सैलरी का कुछ प्रतिशत ही दिया, जबकि लॉकडाउन मार्च के अंतिम सप्ताह में लागु हुआ। 

March.jpg

 अप्रैल के महीने में भी शैक्षणिक कार्य ऑनलाइन माध्यम से जारी रहा।  अप्रैल में ऑनलाइन पढ़ने के साथ ही वेबिनार जैसी सेकड़ो गतिविधियों में भी शिक्षाक व्यस्त रहे, बावजूद इसके देशभर में 15 % ही कॉलेज ऐसे हैं जिन्होंने पूरी सैलरी दी, 47% कॉलेजों ने सैलरी दी ही नहीं और बाकी ने कुछ प्रतिशत सैलरी का दिया।

April.jpg

मई की स्थिति भयावह है।  ऑनलाइन परीक्षा की तैयारियों के बिच बीते मई माह में 93 % प्रतिशत शिक्षकों को पूरी सैलरी नहीं मिली। सिर्फ 7% ही शिक्षक ऐसे हैं जिनके कॉलेज संकट के इस समय में अपने शिक्षकों के साथ खड़े दिख रहे हैं। 

May.jpg

यह स्तिथि उस शिक्षा क्षेत्र की हैं जिसे इस कोरोना संकट में कुछ भी नुकसान नहीं हैं ,अपितु सारे शैक्षिणिक संस्थान अपना ट्रांसपोर्ट और बिजली के बिल बचा कर लाखों के फायदे में ही हैं।  साथ ही छात्रों से भी पूरी फीस वसूली जा रही हैं।  निजी महाविद्यालय प्रबंधन इस संकट में भी अपना खजाना भरने में लगे हुए हैं वही दूसरी और उनके ही कर्चारियों को वेतन ना मिलने से भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हैं। 

उच्च शिक्षा में  हमेशा से ही कई अनियमित्ता होती रही हैं जैसे मूल सर्टिफिकेट्स रख लेना ए वेतन का गाइडलाइन के हिसाब से ना देनाए एकाउंट्स सही रखने के लिए ज्यादा सैलरी देकर फिर जमा करा लेना या एडमिशन के लिए शिक्षकों को सेल्स मेन की तरह घर घर भेजना।  ।प्च्ब्म्न् में ऐसी शिकायत लगभग रोज़ ही आती हैं। 

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा हैं की कंपनियों को कर्मचारियों को वेतन नहीं देने पर कोई कार्रवाई नहीं की जाये क्यों की लॉकडाउन के समय में व्यापर प्रभावित हुआ हैं, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों को इस निर्देश से अलग होकर देखना चाहिए क्योकि स्कूल कॉलेज वास्तु उत्पादन आधारित क्षेत्र नहीं है, यहाँ छात्रों से पूरी फीस लेने के बावजूद अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया जा रहा।

उच्च शिक्षा की गवर्निंग बॉडी AICTE और UGC सैलरी नहीं देने को राज्य का मामला बता कर पल्ला झाड़ लेते हैं।  और दूसरी तरफ अधिकतर निजी कॉलेज राजनेताओ के होने के कारन राज्य सरकारें भी शिक्षकों के हक में फैसला लेने से बचती हैं। 

जब शिक्षकों से पूछा गया की आप अपने संस्थान के आपके प्रति आचरण को कोविड संकट के समय में कैसे आंकते हैं तो 60%शिक्षकों ने बदतर या ख़राब कहा और लगभग 22 %ने औसत रैंकिंग दी हैं।  ।  यह अपने आप में चिंता का विषय होना चाहिए। एक शिक्षक जो किसी भी शैक्षणिक संस्थान का एक मुख्य स्तम्भ होता हैं उससे वैश्विक महामारी के समय में खुद उसी की संस्था ऐसा व्यवहार करती हैं।

Rating.jpg

जहां एक औरAICTE और UGC महामारी के इस दौर में शिक्षकों की ख़राब होती आर्थिक स्थिति पर कोई ठोस निर्णय नहीं लेते हुए सिर्फ ऑनलाइन एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए अपना पूरा ध्यान लगाए हुए हैं और लगभग हर दिन अलग अलग विषयों पर वेबिनार में व्यस्त हैं वही दूसरी और देशभर के शिक्षकों और शिक्षक संघ  ने सोशल मीडिया पर । AICTE और UGC चेयरमैन को अपना विरोध जताना शुरू कर दिया हैं। 

जॉगिंग करते और खेल खेलते हुए  AICTE चेयरमैन डॉ अनिल सहस्रबुद्धे के ट्वीट पर कई शिक्षकों ने अपनी पीड़ा व्यक्त की हैं। एक शिक्षक लिखते हैं “प्राइवेट कॉलेज के कर्मचारी अपनी जॉब और सैलरी के लिए लड़ रहे  हैं” तो दूसरे ने व्यंग किया हैं की “बहुत खूब सर , हम भी पिछले ४ महीने से अपने प्रबंधन के साथ सैलरी पाने के लिए कसरत कर रहे हैं”

ऐसे और भी कई कमेंट हैं जिन्हे जिम्मेदार लोग नज़र अंदाज़ कर रहे हैं। हमे यह समझना होगा की ये किसी एक कॉलेजए एक शिक्षक या एक राज्य की समस्या नहीं हैं। यह एक देशव्यापी समस्या हैं जिसे ।प्ब्ज्म् और न्ळब् जैसी संस्थान सिर्फ सर्कुलर निकाल कर अपने कर्त्तव्य से बच नहीं सकती। सैलरी देने के लिए सख्त शब्दों में निर्देश दिए जाना चाहिए और सभी संस्थानों से लॉकडाउन समय के सैलरी शीट मंगवाना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भी इसमें आगे रहकर शिक्षकों को इस त्रासदी में पूरी सैलरी देने के आवश्यक निर्देश देना चाहिए और इसका पालन नहीं करने वाले संस्थानों को नॅशनल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत कार्रवाही करना चाहिए और उनकी सम्बन्ध्ता रद्द की जानी  चाहिए।

आज का युवा वैसे भी शिक्षक बनना नहीं चाहता और उस पर जिम्मेदारों का ऐसा रवैया रहा तो आने वाले समय में कोई भी शिक्षा के इस क्षेत्र में अपना करियर नहीं बनाना चाहेगा। शिक्षा के क्षेत्र को अगर बचाना हैं शिक्षकों को सम्मान के साथ ही आर्थिक रूप से भी संपन्न बनाना होगा।  किसी भी देश  का आकलन इस बात से  किया जा सकता  हैं की वो अपने शिक्षकों के साथ कैसा व्यव्हार करता हैं।   

आज से लगभग 100 दिन बाद 5 सितम्बर को सभी अपने भाषणों में शिक्षकों को  सम्मान करेंगे, फूल माला पहनाई जाएगी , लेकिन आज जब शिक्षकों की मजबूत करने की जरुरत हैं तब ना तो कॉलेज प्रबंधन ,न सम्बंधित विश्वविद्यालय , न राज्य सरकार , न केंद्र सरकार और ना  ही AICTE और UGC साथ दे रहे हैं। 

3582total visits,2visits today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *